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News Entry# 288575
  
Dec 14 2016 (10:21)  160 साल बाद भी कोहरे में चूना और पटाखे से चल रही है रेल ओस के चलते कभी-कभी धुल जाता है चूना (epaper.livehindustan.com)
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IR AffairsNER/North Eastern  -  

News Entry# 288575     
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Dec 14 2016 (10:21AM)
Station Tag: Gorakhpur Junction/GKP added by ☆अलविदा गोंडा मीटरगेज■☆*^~/206964

Posted by: ☆गोंडा इलेक्ट्रिक शेङ ■☆*^~  5898 news posts
160 साल बाद भी कोहरे में चूना और पटाखे से चल रही है रेल
ओस के चलते कभी-कभी धुल जाता है चूना
रफ्तार के लिए चल रहा है टी-कैस पर ट्रायल
एंटी फॉग डिवाइस करता है अलर्ट
एनके
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अम्बिकेश, मुख्य संरक्षा अधिकारी, पूर्वोत्तर रेलवे
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गोरखपुर आशीष श्रीवास्तवरेलवे की स्थापना के 160 साल बाद भी कोहरे में ट्रेनें पटाखे और चूना के भरोसे ही चल रही हैं। 21वीं सदी में भी रेलवे के पास कोहरे से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। यूरोपीय देशों में जहां काहेरे में भी ट्रेनों की औसत चाल 100 किमी प्रति घंटे होती है वहीं अपने देश में ट्रेनें 40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार पर सिमट जाती हैं।पटाखे की आवाज और चूना से आज भी चालक को सिग्नल के प्रति आगाह किया जाता है। रेलवे के अनुसार कोहरे से निपटने का अभी तक यही सबसे सफल तरीका है। कोई आधुनिक तकनीक विकसित न हो पाने के कारण गाड़ियां 36 घंटे तक लेट चल रही हैं। आए दिन कई ट्रेनें निरस्त हो जा रही हैं। सचाई इससे आगे भी है। पटाखे और चूना डालने के लिए गैंगमैनों की ड्यूटी लगाई जाती है जबकि लगभग सभी क्षेत्रीय रेलवे में गैंगमैन समेत सभी तरह के स्टाफ की कमी चल रही है।
किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही हैं ट्रेनें
होम सिग्नल से 1400 मीटर पहले चूने की मार्किंग की जाती है। 270 मीटर पहले पटाखा लगाया जाता है। घने कोहरे में ओस के चलते कभी-कभी चूना भी धुल जाता है। ऐसे में चालक को सिग्नल की सटीक जानकारी नहीं मिल पाती है जिससे रफ्तार और कम हो जाती है।ट्रेनों की आपस में टक्कर रोकने और कोहरे के समय बिना ब्रेक के गाड़ी चलाने के लिए आरडीएसओ टी-कैस (ट्रेन कोलिजन एवाइडेंस सिस्टम) विकसित कर चुका है लेकिन कुछ कमियों के चलते अभी इस पर सिकन्दराबाद में ट्रायल चल रहा है। अगर यह सफल हुआ तो ट्रेनों की आपस में टक्कर तो रुकेगी ही साथ ही कोहरे में भी पूरी रफ्तार से ट्रेनें दौड़ सकेंगी।
रेलवे लाइन पर सिग्नल के लिए लगाया गया पटाखा
बीते वर्षों में आरडीएसओ ने एंटी फॉग डिवाइस तैयार किया है जो इंजन में लगाए जाते हैं। यह डिवाइस चालक को यह बताते हैं कि आगे सिग्नल आने वाला है। इस डिवाइस चालक अलर्ट तो हो जाता है लेकिन कितनी दूरी पर सिग्नल आने वाला है इसकी सटीक जानकारी नहीं मिल पाती है। ऐसे में हर मेन सिग्नल के पहले पटाखा लगाया जाता है। सिग्नल थोड़ी दूर से ही दिखे इसके लिए चूने से मार्किंग की जाती है।कोहरे से निपटने का यह सबसे कारगर तरीका है। इससे किसी भी प्रकार की अनहोनी की आशंका न के बराबर रहती है। काफी पुरानी तकनीक है। आज भी काम में लाया जा रहा है।
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