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Sat Nov 25, 2017 00:21:51 ISTHomeTrainsΣChainsAtlasPNRForumGalleryNewsFAQTripsLoginFeedback
Sat Nov 25, 2017 00:21:51 IST

Blog Entry# 1985121
Posted: Sep 08 2016 (20:39)

11 Responses
Last Response: Sep 09 2016 (00:54)
  
बजट के आम बजट में समाहित होने पर कोई चर्चा भी नहीं हुई तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम पैसेंजरों का ही होगा
सरकार के संकेतों से साफ हो चला है कि रेल बजट अब इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा। अलग से रेल बजट पेश करने की बजाय उसे आम बजट का ही हिस्सा बना दिया जाएगा। इस तरह आगे से न तो कोई रेल बजट होगा, न ही उस पर संसद में कोई बहस हो पाएगी। जिस तरह आम बजट में दूसरे मंत्रालयों का जिक्र होगा, उसी तरह रेलवे का भी हो जाएगा। लेकिन क्या इससे रेलवे और रेल में सफर करने वाली जनता का कुछ भला होगा/ क्या इससे रेलवे की आमदनी बढ़ जाएगी, या फिर उसकी उत्पादकता पर
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कोई पॉजिटिव असर पड़ेगा/ रेल बजट को समाप्त करने के पक्षधर लोग इसे एक बड़ा रिफार्म बता रहे हैं। लेकिन यह रिफॉर्म है, या सिर्फ एक बदलाव/
अंधेरे में यात्री
हर बदलाव रिफॉर्म यानी सुधार नहीं होता। अगर रेल बजट को समाहित करके अलग से बजट की छपाई को खत्म करना, संसद में उस पर बहस में ‘जाया होने वाला’ संसद का वक्त बचाना, सांसदों की अपने क्षेत्र में लाइनें बिछाने, ट्रेनें चलाने का दबाव खत्म करना ही इस फैसले का मकसद है तो इसे रिफॉर्म नहीं कहा जा सकता। यह तर्क इसलिए भी लचर माना जाएगा, क्योंकि ऐसे रिफॉर्म का मतलब यह है कि सरकार जिन जगहों पर दबाव न झेल सके, उन्हें खत्म ही कर देना चाहिए। ऐसे में तो अगर किसी विभाग में करप्शन हो और उस विभाग की मशीनरी ही कमजोर हो तो क्या उसे खत्म कर देना चाहिए/ ऐसे तो सरकार को अपने ज्यादातर महकमे बंद कर देने होंगे, क्योंकि करप्शन की शिकायतें किस विभाग से नहीं आतीं/
रेल बजट को आम बजट में समाहित करने के बाद वहां रेलवे को कितनी जगह मिल पाएगी, यह अभी साफ नहीं है। क्या वित्त मंत्री उसी तरह से रेल बजट पढ़ेंगे, जैसे रेल मंत्री पढ़ते थे, या फिर रेलवे के समूचे लेखे-जोखे को एक एनेक्सर की तरह यूज किया जाएगा/ यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इस फैसले को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं इससे रेलवे की पारदर्शिता ही खत्म न हो जाए। इसकी आशंका इसलिए है, क्योंकि आजादी के बाद के सात दशकों में रेलवे का कामकाज जनता को साफ नजर आता है। उसकी दुर्दशा की भी चिंता होती है और उसकी अच्छाई भी लोगों तक पहुंचती है। यहां तक कि यह जानकारी भी मिलती है कि रेलवे को एक रुपया कमाने के लिए 90 पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं या 95 पैसे। लेकिन क्या रेल बजट खत्म होने के बाद यह सब हो पाएगा/ क्या किसी को पता चलेगा कि रेलवे की आर्थिक हालत क्या है/
इसे दूसरे रूप में भी देखा जा सकता है। अभी रेलमंत्री बजट में घोषणाएं करते हैं तो एक साल के बाद पता चलता है कि उन्होंने जितने ऐलान किए थे, उनमें से कितने पूरे हुए और कितने हवाई साबित हुए। लेकिन जब बजट का ही पता नहीं चलेगा तो कौन जान पाएगा कि रेलवे ने क्या करने को कहा था और क्या किया/ भारत जैसे देश में रेलवे से जुड़ी सबसे अहम बात यह है कि यह आम लोगों का यातायात साधन है और लोग इससे जुड़े हुए हैं। देश के हर कोने में लोगों को उम्मीद होती है कि उनके क्षेत्र को इस बार रेल बजट में जरूर कुछ न कुछ मिलेगा। लेकिन अगर रेल बजट ही नहीं होगा तो फिर कौन क्या उम्मीद करेगा/ यूं कहें कि देश के इस सबसे बड़े सरकारी कमर्शल वेंचर से जनता की उम्मीदें ही खत्म हो जाएंगी। क्या यह जरूरी नहीं है कि रेल बजट को समाप्त करने का फैसला लेने से पहले देश में इस पर बहस हो/ क्या लोगों के सामने यह साफ नहीं होना चाहिए कि इस कदम से देश का फायदा होगा या नुकसान /
इस निर्णय के पक्ष में दिया जा रहा यह तर्क भी दिलचस्प है कि रेल बजट बनाने में लंबा वक्त लगता है, उस पर पैसा खर्च होता है और फिर संसद में लंबी-चौड़ी बहस होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या रेल बजट को आम बजट में समाहित कर देने से ही रेलवे की उत्पादकता बढ़ जाएगी, उसका घाटा कम हो जाएगा और वह रातोंरात एक चमकता हुआ ऑर्गनाइजेशन बन जाएगा/ यह सही है कि रेल बजट बनता है तो वक्त भी लगता है और उसके छपने पर कागज भी खर्च होता है लेकिन यह क्यों नहीं सोचा जाता कि जब बजट बनता है तो उससे पहले प्लानिंग होती है। रेलवे अफसरों पर दबाव होता है कि वे सुविधाओं के विस्तार के लिए नए आइडिया लाएं। इसके साथ पिछले बजट के वादों को पूरा करने की चिंता भी जुड़ी होती है, वरना सरकार के लिए संसद में जवाब देना मुश्किल हो जाता है।
नौकरशाही का दबदबा
संसद में जब रेल बजट पर चर्चा होती है तो सांसद उस दौरान अपनी शिकायतें भी रखते हैं। लेकिन ये शिकायतें उनकी अपनी नहीं, उनके क्षेत्र की जनता की होती हैं। इस तरह जनता का फीडबैक संसद में गूंजता है और उसका असर भी होता है। लेकिन अगर रेल बजट के आम बजट में समाहित होने पर कोई चर्चा भी नहीं हुई तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम पैसेंजरों का ही होगा। वैसे सवाल यह भी है कि अगर रेलवे पर चर्चा न होने से इसका भला हो जाएगा, तो फिर आम बजट पर भी तो इसी तरह तैयारियां होती हैं। ऐसे में क्या देर-सबेर उसे भी खत्म कर दिया जाएगा और सरकार का हर काम नौकरशाही के दबदबे में ही चला करेगा/
(लेखक एनबीटी के सहायक संपादक हैं)
इसे आम बजट में समाहित करने से रेलवे की पारदर्शिता कम होगी

6 posts - Thu Sep 08, 2016

  
Prabhu ke liye sukun wali news.... Ir ki Train ab time se chal rahi ....rly ke survey ke hisab se Operating ratio 82% huwa

  
Sep 08 2016 (21:27)
©The Dark Lord™~   8729 blog posts   2 correct pred (67% accurate)
Re# 1985121-8            Tags   Past Edits
NTES k farji updates ka asar.

  
Sep 08 2016 (23:01)
☆गोंडा इलेक्ट्रिक शेङ ■☆*^~   15592 blog posts   3090 correct pred (65% accurate)
Re# 1985121-9            Tags   Past Edits
Mgs-ald may train kuch sudhri h ...ye baat to h

  
2153 views
Sep 09 2016 (00:35)
DhnEcr~   5933 blog posts
Re# 1985121-10            Tags   Past Edits
13131 ko short terminate kiya hai upto PNBE aur kauns si train hati hai bhala

  
Sep 09 2016 (00:54)
anirudhpuri~   1826 blog posts
Re# 1985121-11            Tags   Past Edits
Bhai trains k distance k according time bahot jyada hai.... time par to chalegi hi.... abhi time par chal rahi hai fir b4 bhi chalegi.... or credit prabhu ko milega.... sabko ullllu bana gaye.... waah prabhu waah

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