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Mon Aug 21, 2017 19:50:52 ISTHomeTrainsΣChainsAtlasPNRForumGalleryNewsFAQTripsLoginFeedback
Mon Aug 21, 2017 19:50:52 IST
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Blog Posts by trainloverfromCR1979~
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02
Station Tip
Sightseeing
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330 views
Jun 21 2017 (15:04)   WRR/Warora (4 PFs)

trainloverfromCR1979~   216 blog posts   2462 correct pred (69% accurate)
Entry# 2327990            Tags   Past Edits
Nearest railway station to "Anandwan" an ashram and rehabilitation center for leprosy patients started by social activities Baba Amte in 1952. Another project "Lok Biradari Prakalp" was also setup by Baba Amte at Hemalkasa is approx 250 KMS from Warora
  
★★★  Travelogue
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3053 views
Jun 18 2017 (02:15)   75204/Raxaul Muzaffarpur DEMU | RXL/Raxaul Junction (5 PFs)

Guest: 391d4107   show all posts
Entry# 2324493            Tags   Past Edits
2 compliments
Awesome 🤘✌ As usual stupendous
Part 1- /blog/post/2317929
Part 2 - Return Journey
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“जल्दी चलिए, ट्रेन निकल जायेगी” ये मैंने उस रिक्शा वाले को कहा जिसके 3 पहिया मानव चालित रिक्शा पे सवार हुए हम स्टेशन की तरफ जा रहे थे| मेरी हरबराहट और बेचैनी का उसने बड़ा ही सहज और सरल जवाब दिया, ‘’ ये रिक्शा है मालिक, मोटर गाड़ी नहीं”....मै मन ही मन
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उसकी बातो तो सुन कर हंश पड़ा, ये रिक्शा ही तो है, छोटे शेहरो की पहचान है ये रिक्शा| सही तो कह रहा है वो, ये मोटर गाड़ी नहीं जिसमे तेल जलता हो, यहाँ इसे चलाने वाले का खून जलता है, इस चिलचिलाती धुप में जहाँ किसी को घर से बाहर निकले के नाम से ही पसीने छूट जाए उस गर्मी में ये अपने खून को जलाता है ताकि इसके घर का चूल्हा जल सके| मै ये सब सोच ही रहा था की उस मेहनतकस इन्सान ने मुझे बताते हुए कहा, “ आ गया स्टेशन”....ऐसा लगा जैसे किसी ने नींद से झग्झोर कर जगा दिया हो| मै उसके रिक्शा से अपना बोरिया बिस्तर समेटते हुए उतरा और अपनी जेब से पैसे निकाल कर उसे दे दिए| उसने उन पैसो को गिना फिर बिना कुछ बोले उसने उन पैसो को अपने बटुए में रख लिए| मैंने उसकी ओर देखा, उसके चेहरे पर एक असंतोष का भाव था, लग रहा था वो मन ही मन कह रहा हो, ”कुछ और मिल जाते तो और अच्छा होता”| मेरी दिल ने उसके दिल की आवाज को समझ लिया और मैंने उसे रोका और कुछ और पैसे उसे दे दिए, उसने कुछ नहीं कहा पर एक संतोष का भाव उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था| ये कोई एहसान नहीं था, ये मेरी क्रित्ग्नता थी उसके सेवा के प्रती वरना Service Tax तो हम निरर्थक ही चुकाते है| मै स्टेशन की तरफ बढ़ जाता हू...
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टिकट खिड़की के बाहर लम्बी कतार लगी थी, डोलते हुए पंखे के निचे पसीने से तर-बतर हुए सभी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे| “लाइन से आइये भैया” मेरे पीछे खड़े सजन्न ने एक दुसरे सजन्न से कहा जो बिना कतारबद्ध हुए टिकट खिड़की तक पहुचना चाह रहे थे, खैर मेरा नंबर भी आ ही गया और अपने पिछले अनुभव से सीख ले कर छुट्टे पैसे टिकट खिड़की पे बैठे बाबु की ओर बढ़ाये और अपना टिकट उनसे लिया...
मै प्लेटफार्म पे पंहुचा तो देखा की ररक्सौल-मुजफ्फरपुर पैसेंजर लगी हुई है पर उसके रवाना होने में अभी ४० मिनट बचे है, मैंने उस निरर्थक समय को सार्थक बनाने को सोचा और स्टेशन के बाहर अलगी छोटी मोटी दुकानों के अवलोकन को निकल पड़ा| ‘’ 20 रुपये प्लेट खाना” ये कहते हुए मेरी तरफ आशा भरी नजरो से स्टेशन के बाहर बने भोजनालय के सहायक ने देखा पर मैंने उससे नजरे फेर ली| घुमते टहलते मै चाय की दूकान तक पहुँच गया, जिसे मै नजरअंदाज ना कर सका...
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ट्रेन के खुलने में अब २५ मिनट बचे थे तो मै ट्रेन की और चल पड़ा| छिट पूट लोग नजर आने लगे थे, तापमान के साथ ट्रेन में यात्रिओ की भीड़ भी बढ़ने लगी| मेरी सामने की सीट पर एक मोहतरमा अपने पति के साथ आ कर बैठ गई, देखते ही देखते ट्रेन के जाने का वक़्त हो गया और गाड़ी रेंगती हुई पल्त्फोर्म से बाहर निकलने लगी| झूसला देने वाली गर्मी के कारण रेलवे लाइन के आस पास लगे पेड़ पौधे भी जीवन रहित लग रहे थे| उनको देख कर लग रहा था की कितनी बेचनी से उन्हें बरखा का इन्तेजार हो, बारिश की एक एक बूँद उनके लिए संजीवनी बूटी साबित होगी| ट्रेन के अन्दर का तापमान भी हमारा हाल कुछ ऐसा ही बना रहा था| ट्रेन रफ़्तार पकडती है, गरम हवा के झोंके पसीने को उड़ा ले जाते है तो थोडा चैन मिलता है| धुप और छाओ की आंख मिचोली के बीच ट्रेन सगौली पहुचती है, स्टेशन पर कोलाहल मच जाता है, समोसे वाले, पानी वाले, नारियल वाले सभी आपने अपने साजो सामान के साथ आते और उन्हें यात्रिओ को बेचने का अथक प्रयास करते| दूकान उनके पास चल कर आ रहा है यह सोच कर यात्री भी खूब ठसक दिखाते, भारतीय रेल को एक अलग रूप देने का क्ष्रेय इनलोगों को भी जाता है, उन विक्रेताओ के लिए ट्रेन केवल यात्रा का नहीं बल्कि रोजगार का भी साधन है|
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आखिर वही हुआ जिसका डर था, एक चचा सिर पर टोकरी लिए चिल्लाते पहुचते है, ‘’मूंग फली...मूंग फली”, मेरे सामने की सीट पर बैठी मोहतरमा के पति मूंग फली खरीदते है और उसे खाना सुरु करते है| चेहरे और वेश भूसा से पढ़े लिखे दिखने वाले लोगो की हरकत देख कर मै अचंभित रह गया, ट्रेन का डब्बा उनके लिए कुरेदान बन चूका था, मूगं फली के छिलके चारो और बिखरने लगे| मैंने उनेक पति को कहा की आप तो पढ़े लिखे लगते है फिर भी ऐसी हरकत क्यों कर रहे है, जिसका उन्होंने बड़ा ही बचकाना जवाब दिया, “भाई, ट्रेन तो गन्दा होगा ही, हम करे या कोई और”| मै उनके इस तर्क से अचंभित रह गया| मुझे लगा की ये लोग सीधे तरीके से मानने वालो में से नहीं, मैंने अपना मोबाइल निकला और उनसे कहा की अगर वो अभी भी ऐसा करना नहीं छोड़ेंगे तो मै उनकी इस हरकत का विडियो बना कर रेलवे की अधिकारिओ को भेज दूंगा और इसका जुरमाना 1000 रुपये है| पत्नी ने पति से कहा, “छोरो घर जा कर खा लेंगे, आज के ज़माने में इन भाईसाब को गाँधी बनना है”| उनके इस तंज से मुझे दुख नहीं, ख़ुशी इस बात की हुई की मेरी प्रयासों से मैं आज किसी को कुछ गलत करने रोक पाया| ट्रेन अपने गंतव्य की और पहुचने के लिए रफ़्तार पकडती है, इंद्र देव की कृपा से चिलचिलाती धुप सुहाने मौसम में बदल जाती है| फिर क्या था, मै उन पति-पत्नी को मेरी बुराई करने की खुली छूट दे कर दरवाजे के पास आ कर बैठ जाता हु| ट्रेन छोटे मोटे स्टेशनओ पे रुकते हुए मुजफ्फरपुर पहुँचती है, और इस यात्रा का अंत होता है...
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**Travelogue mobile pe type kiya hai or mobile se Hindi likha utna hi asaan hai jitna Swatantantra Senani ka time se chalna so bhool-chhok maaf kerna or apna feedback jaroor dena.

6 posts are hidden.

  
1941 views
Jun 19 2017 (15:03)
trainloverfromCR1979~   216 blog posts   2462 correct pred (69% accurate)
Re# 2324493-13            Tags   Past Edits
Great narration like last time :)
  
★★★  Travelogue
1 Followers
3213 views
Jun 13 2017 (01:04)   15201/Patliputra - Raxaul InterCity Express | MFP/Muzaffarpur Junction (6 PFs)

Guest: 391d4621   show all posts
Entry# 2317929            Tags   Past Edits
3 compliments
classy Mast tha Awesome writeup
“छुट्टे नहीं है क्या’’ ये शब्द थे टिकट खिड़की पे बैठे बाबु के, मैंने अपने बटुए को टटोला पर अथक प्रयास करने के बाद भी छुट्टे पैसे नहीं मिले | मैंने कहा, “नहीं है सर” वो मुझे ऐसे घूरे जैसे मैंने उनसे उनकी बेटी का हाथ मांग लिया हो फिर विवस होकर अपने मेज की दराज में हाथ डाला और पैसे निकाल कर मेरी ओर बढाया, उनके चेहरे का भाव ऐसा था जैसे मन ही मन कह रहे हो, “दुबारा खुल्ले पैसे लेके ही टिकट लेने आना” खैर मैंने टिकट और पैसे लिए और प्लेटफार्म की तरफ बढ़ चला...
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ये यात्रा वृत्तांत है अपनी दोस्त की बहन की विवाह उत्सव में समिल्लित होने के लिए बिहार और नेपाल की सीमा पे बसे एक छोटे से कस्बे रक्सौल तक जाने की|
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मै प्लेटफार्म पे पंहुचा तो देखा की रक्सौल तक जाने वाली, पाटलिपुत्र से आने वाली इंटरसिटी अभी तक नहीं आई है, मन ही मन मै खुश हो गया और सोचने लगा की चलो अच्छा ही हुआ| एक रेल प्रेमी को अपनी मोहब्बत का तफसील से दीदार करने का मौका तो मिला, मै ये सोच ही रहा था की स्टेशन प्रांगन में लगे लाउड स्पीकर पे बाबु ने घोषणा की, “ दरभंगा से चल कर सोनेपुर, बलिया, बनारस, जबलपुर के रास्ते पुणे को जाने वाली ज्ञान गंगा एक्सप्रेस प्लात्फ्रोम संख्या 3 पर आ रही है” ये सुनते ही एक कोलाहल सा मच गया, यात्रिओ के जत्थे प्लेटफार्म संख्या 3 की और बढ़ने लगे, मै भी उनके साथ चल दिया|
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लोगो से ठसा ठस भरी गारी प्लेटफार्म में दाखिल होती है, प्लेटफार्म पे खड़े यात्रिओ में उस ट्रेन पे सवार होने की एक बेचैनी सी फैल जाती है, लोगो को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो ट्रेन ना हो समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश हो और हर कोई उसे चखना चाहता हो| लोग एक दुसरे को धक्का दे रहे, बच्चे व्याकुल हो रो रहे थे, लग रहा था मानो आपकी आँखों के सामने मल युद्ध चल रहा हो| खैर जैसे तैसे कुछ लोग चड़ने में कामयाब होते है, उनके लिए ये गर्व का विषय था उन्होंने एक युद्ध में फ़तह हासिल की थी| ट्रेन सीटी बजाती है और आगे की और निकल जाती है, पीछे छूट जाते है कुछ अभागे जिनको इस जंग में शिकस्त का मूह देखना पड़ा और अब उन्हें टिकट वापसी की चिंता सता रही थी|
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लाउडस्पीकर पर घोषणा, राजधानी प्लेटफार्म संख्या 3 पर आ रही है| तीव्र गति में गाड़ी प्लेटफार्म में दाखिल होती है, अमीरों की ट्रेन में भी एक रुआब...एक ठसक होती है| बड़ी बड़ी सूटकेस लिए यात्री ट्रेन में बड़ी आसानी से चढ़ जाते है, उन्हें कोई युद्ध नहीं करना पड़ा| मैंने भी मौके का फायदा उठाया और सामने खडी राजधानी की २-४ तस्वीरे ले लिए| बगल में खड़े चचा ने ऐसा अवलोकन किया मानो मै उसी क्षण मंगल से धरती पे पधार रहा हु| तभी बगल की बेंच पे बैठे एक बच्चे ने अपनी दादी से पूछा, ये कैसी ट्रेन है, हम तो ऐसी ट्रेन में कभी नहीं चढ़ते| देखने से अति साधारण वर्ग से तालुख रखने वाली दादी ने सीधे शब्दों में कहा, ये अमीरों की ट्रेन है बेटा| बाल मन विद्रोही होता है, उसे अमीरी गरीबी का फर्क नहीं दीखता| बच्चा अपनी दादी से कहते हुए कल्पना करने लगता है की जाने कैसा दीखता होगी ये ट्रेन भीतर से...तभी मेरे सब्र का बांध टूट जाता है और अनायास उस बच्चे से पूछ बैठता हु, “चलोगे ट्रेन को अन्दर से देखने”| बच्चा फट से हा बोल देता है पर उसकी दादी थोडा हिचकती है एक अनजान आदमी के साथ अपने बच्चे हो जाने देने में पर बच्चे के जीद के सामने उसकी उस झिझक की एक नहीं चलती| बच्चे को मै राजधानी एक्सप्रेस के अंदर लेकर पहुँचता हु, उसकी आँखों की चमक चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थी की मैंने अपनी जीवन में पहले कुछ इतना भव्य नहीं देखा था, वह हर चीज को अपनी आँखों में समेट लेना चाहता था| १० मिनट बीत गये और ट्रेन के जाने का वक्त हो गया, हम ट्रेन से बाहर आ गये| सीटी बजी और गाड़ी अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली| मेरी इंटरसिटी के आने की भी घोषणा हो गई थी, वो प्लेटफार्म संख्या २ पर आ रही थी जो की प्लेटफार्म संख्या 3 से बहूत दूर है इसलिए मैंने भी अपनी मंजिल की और बढ़ने के लिए अपने बैग को अपने हाथो में ले लिया, जाने से पहले उस बच्चे ने मुझे प्रणाम किया और मै अपनी ट्रेन को पकड़ने निकल पड़ा| यात्रा सुरु होने से पहले ही मुझे बहूत कुछ मिल चूका था, मिला था एक दोस्त जो इंडिया शिनिंग से अभी भी मिलो दूर कही खड़ा है और इन्तेजार कर रहा है की कब उसके भी सपने पुरे होंगे, कब उसे अपनी इक्षाओ को कचोटना नहो पड़ेगा, कब उसे अपने अरमानो का गला नहीं घोटना पड़ेगा, जिस दिन ये सब कुछ हो गया उस दिन सही में मेरा भारत महान हो जायेगा|
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प्लेटफार्म संख्या २ पे इंटरसिटी आती है, ट्रेन में एक दीन दयालु कोच लगाया गया है| मुजफ्फरपुर में ट्रेन आधी खली हो जाती है, मैं उस दीन दयालु कोच की गद्दे लगे उपरी सीट पर लेट गया, दिन भर की भागम भाग के बाद हिम्मत नहीं थी की और कुछ कर सकू| रात हो चुकी थी, ट्रेन मुज़फ्फरपुर से रक्सौल के लिए बढ़ चली और मै देखते ही देखते सो गया| एक झटके से आँख खुली तो पता चला की ट्रेन सगौली पहुँच चुकी है और नरकटियागंज जाने वाले हिस्से को काट कर अलग किया जा रहा है| मै ट्रेन से बाहर आया और स्टेशन पे बने बेंच पर बैठ गया तभी भारतीय रेल की पहचान बन चुकी आवाज मेरी कानो पे पड़ी, ‘’चाय-चाय’’| प्लेटफार्म पे बैठे बैठे मैंने चाय पी, तब तक ट्रेन भी जाने को तैयार हो गई फिर हमेशा की तरह मैंने दरवाजे पे कब्ज़ा जमाया और ठंडी ठंडी हवा का आनंद लेते रक्सौल पहुँच गया...
**Travelogue mobile pe type kiya hai or mobile se hindi likhna utna hi aasaan hai jitna Tatkaal me confirm ticket nikalna so bhool-chhok maaf kerna or apna feedback jaroor dena.

23 posts are hidden.

  
1498 views
Jun 14 2017 (14:21)
trainloverfromCR1979~   216 blog posts   2462 correct pred (69% accurate)
Re# 2317929-26            Tags   Past Edits
Fantastic narration. This is not just a travelogues but a story. Moved by the way you described about a small boy looking at Rajdhani train. Nice of you that you showed him train from the inside and made his day :)

  
1411 views
Jun 14 2017 (15:27)
Guest: 391d4094   show all posts
Re# 2317929-27            Tags   Past Edits
Thanks sir. Frankly speaking, that incident just made my day.

1 posts are hidden.
  
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Train Tip
Toilet/Water/Cleanliness
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1036 views
May 03 2017 (13:33)   17222/Mumbai LTT - Kakinada Port Express

trainloverfromCR1979~   216 blog posts   2462 correct pred (69% accurate)
Entry# 2260904            Tags   Past Edits
OBHS was available in sleeper class of the train. There was a family travelling in our bay and they had a son who probably was not well. He ate/drank something and throwed up. Another passenger in our bay immediately called OBHS staff and he cleaned the floor quickly. Water was available in toilet of S5 coach. Cleanliness in the train and toilet was average. Our seats were having dust on them so we had to clean it up with papers that we carried.
  
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Train Tip
Speed/Punctuality
0 Followers
1015 views
May 03 2017 (13:22)   17222/Mumbai LTT - Kakinada Port Express

trainloverfromCR1979~   216 blog posts   2462 correct pred (69% accurate)
Entry# 2260881            Tags   Past Edits
When I travelled, the train reached Pune 1 hour 20 minutes late but covered the distance from Pune to Daund in just over 1 hour.
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    There has recently been a lot of frustration among RFs when their Station Pics, Loco Pics, Train Pics get rejected because the "number is not showing", "shed is not visible", the loco/train is at a distance, Train Board is too small, "better pic available", etc. . To address this issue, effective tomorrow, ALL...
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  • Entry# 2134907
    Jan 21 2017 (02:46PM)


    It has been over 2 weeks since the appointment of the current batch of FMs and 750 Complaints have been handled so far. It gives me immense pleasure in congratulating them for running the team diligently, professionally, competently and above all, without a shred of controversy or bias. The FM position...
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